History 12th Book 1 chapter 4 विचारक विश्वास और इमारतें subjective

 


History 12th Book 1 chapter 4 विचारक विश्वास और इमारतें subjective 

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

1. जैन धर्म में 'तीर्थंकर' से क्या आशय है?

उत्तर: जैन धर्म में 'तीर्थंकर' उन महान सिद्ध पुरुषों को कहा जाता है जिन्होंने अपनी तपस्या से क्रोध, मोह और लोभ पर विजय प्राप्त की हो। शाब्दिक अर्थ में, तीर्थंकर वे 'पुल निर्माता' हैं जो मनुष्यों को संसार रूपी सागर (जन्म-मरण के चक्र) से पार पहुँचाकर मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं।

2. जैन धर्म के 'पांच महाव्रत' कौन-कौन से हैं?

उत्तर: जैन धर्म के पांच अनिवार्य नैतिक सिद्धांत, जिन्हें महाव्रत कहा जाता है, निम्नलिखित हैं:

  1. सत्य: सदा सत्य बोलना।

  2. अहिंसा: किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कष्ट न पहुँचाना।

  3. अस्तेय: चोरी न करना।

  4. अपरिग्रह: आवश्यकता से अधिक धन या संपत्ति का संचय न करना।

  5. ब्रह्मचर्य: इंद्रियों पर नियंत्रण रखना और पवित्र जीवन जीना।

3. वर्धमान महावीर की किन्हीं दो प्रमुख शिक्षाओं का उल्लेख करें।

उत्तर: वर्धमान महावीर की दो प्रमुख शिक्षाएं इस प्रकार हैं:

  • त्रिरत्न का पालन: मोक्ष प्राप्ति के लिए सम्यक ज्ञान (सही ज्ञान), सम्यक दर्शन (सही विश्वास) और सम्यक चरित्र (सही आचरण) का होना आवश्यक है।

  • अहिंसा पर बल: महावीर के अनुसार संसार के सभी कणों (यहाँ तक कि पत्थर और जल) में भी जीव है, अतः अहिंसा का पालन परम धर्म है।

4. दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय में मुख्य अंतर क्या हैं?

उत्तर: | विशेषता | दिगंबर | श्वेतांबर |

| :--- | :--- | :--- |

| वस्त्र | ये पूर्णतः नग्न रहते हैं और दिशाओं को ही अपना वस्त्र मानते हैं। | ये श्वेत (सफेद) रंग के वस्त्र धारण करते हैं। |

| कठोरता | यह मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत कठोर तप और नियमों पर बल देता है। | यह दिगंबर की तुलना में थोड़ा उदार और सरल मार्ग है। |

| परंपरा | इसे जैन धर्म का प्राचीन और मूल रूप माना जाता है। | इसे जैन धर्म का अपेक्षाकृत नवीन या परिवर्तित रूप माना जाता है। |

5. बौद्ध धर्म के अष्टांगिक मार्ग के किन्हीं चार अंगों के नाम लिखिए।

उत्तर: दुखों से मुक्ति पाने के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग बताया, जिसके चार अंग निम्न हैं:

  1. सम्यक दृष्टि (सही नजरिया)

  2. सम्यक संकल्प (सही निश्चय)

  3. सम्यक वाक/वाणी (सत्य और प्रिय बोलना)

  4. सम्यक कर्मांत (अच्छे कर्म करना)

6. बौद्ध धर्म से संबंधित किन्हीं चार महत्वपूर्ण स्थलों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: * लुंबिनी: महात्मा बुद्ध का जन्म स्थान (नेपाल)।

  • बोधगया: जहाँ बुद्ध को 'ज्ञान' (बोध) की प्राप्ति हुई।

  • सारनाथ: जहाँ बुद्ध ने अपना 'प्रथम उपदेश' दिया।

  • कुशीनगर: जहाँ बुद्ध का महापरिनिर्वाण (मृत्यु) हुआ।

7. महात्मा बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति और निर्वाण स्थल का नाम बताएं।

उत्तर: महात्मा बुद्ध ने बिहार के बोधगया में निरंजना नदी के तट पर पीपल के वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था। उनकी मृत्यु या निर्वाण (महापरिनिर्वाण) उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुआ था।

8. बुद्ध द्वारा बताए गए 'चार आर्य सत्यों' की व्याख्या करें।

उत्तर: बुद्ध के चार आर्य सत्य बौद्ध दर्शन का आधार हैं:

  1. दुःख: संसार दुखों से भरा है।

  2. दुःख समुदाय: दुखों का मुख्य कारण 'तृष्णा' (इच्छा या लालच) है।

  3. दुःख निरोध: इच्छाओं का त्याग करके ही दुखों को समाप्त किया जा सकता है।

  4. दुःख निरोध मार्ग: दुखों के अंत के लिए 'अष्टांगिक मार्ग' का अनुसरण करना चाहिए।

9. भारत के बाहर किन देशों में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ?

उत्तर: महात्मा बुद्ध के शांति और करुणा के संदेश भारत की सीमाओं को पार कर कई देशों में फैले, जिनमें श्रीलंका, चीन, जापान, तिब्बत और म्यांमार प्रमुख हैं।

10. 'त्रिपिटक' से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: त्रिपिटक बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण धर्मग्रंथ हैं, जो पाली भाषा में लिखे गए हैं। ये तीन हैं:

  1. सुत्त पिटक: बुद्ध के उपदेशों और सिद्धांतों का संकलन।

  2. विनय पिटक: बौद्ध भिक्षुओं और संघ के अनुशासन हेतु नियम।

  3. अभिधम्म पिटक: बौद्ध दर्शन की दार्शनिक व्याख्या।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Question)

1. महावीर स्वामी के जीवन वृत्त एवं उनकी शिक्षाओं का विस्तार से वर्णन करें।

उत्तर: जीवन परिचय:

जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म 540 ईसा पूर्व में बिहार के वैशाली के पास कुंडग्राम में हुआ था। उनके पिता 'सिद्धार्थ' ज्ञात्रक कुल के राजा थे और माता 'त्रिशला' लिच्छवी राजकुमारी थीं। उनके बचपन का नाम वर्धमान था। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृह त्याग कर संन्यास धारण किया। 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्हें ऋजुपालिका नदी के तट पर 'कैवल्य' (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। उन्होंने अपना प्रथम उपदेश राजगृह में दिया। 72 वर्ष की आयु में 468 ईसा पूर्व में पावापुरी में उनका निर्वाण हुआ।

प्रमुख उपदेश एवं शिक्षाएं:

  1. पंच महाव्रत: उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के पालन पर जोर दिया (ब्रह्मचर्य उन्होंने स्वयं जोड़ा था)।

  2. त्रिरत्न: उन्होंने जीवन का लक्ष्य मोक्ष बताया, जिसे सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

  3. कठोर तप: महावीर स्वामी का मानना था कि निर्वाण के लिए कायाक्लेश (शरीर को कष्ट देना) और उपवास आवश्यक है।

  4. समानता: उन्होंने जाति-पाति का विरोध किया और मनुष्य के कर्मों को प्रधानता दी।

  5. अहिंसा: उनके अनुसार न केवल मनुष्यों और पशुओं, बल्कि पेड़-पौधों और निर्जीव वस्तुओं में भी आत्मा होती है, अतः किसी को भी चोट नहीं पहुँचानी चाहिए।




महत्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. महात्मा बुद्ध के जीवन और उनके प्रमुख उपदेशों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: जीवन परिचय:

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल की तराई में स्थित लुंबिनी में हुआ था। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के राजा थे और माता मायादेवी थीं। सिद्धार्थ का लालन-पालन उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया। उनका विवाह यशोदारा से हुआ और उनका एक पुत्र था जिसका नाम राहुल था। 29 वर्ष की आयु में शांति की खोज में उन्होंने गृह त्याग दिया (महाभिनिष्क्रमण)। कठिन तपस्या के बाद, 35 वर्ष की आयु में बिहार के बोधगया में निरंजना नदी के तट पर उन्हें ज्ञान (बोध) प्राप्त हुआ। उन्होंने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया और 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।

प्रमुख उपदेश एवं शिक्षाएं:

  • चार आर्य सत्य: बुद्ध ने संसार को दुखों से मुक्त करने के लिए चार सत्य बताए: दुःख, दुःख समुदाय (कारण), दुःख निरोध (समाधान) और दुःख निरोध मार्ग।

  • अष्टांगिक मार्ग: दुखों के अंत के लिए बुद्ध ने आठ मार्ग बताए जिनमें सम्यक दृष्टि, सम्यक वाणी, सम्यक संकल्प और सम्यक कर्म आदि शामिल हैं।

  • 10 शील: नैतिक जीवन के लिए उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे 10 शीलों के पालन का निर्देश दिया।


2. बौद्ध धर्म के पतन के प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: भारत में बौद्ध धर्म के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

  1. संघ में भ्रष्टाचार: समय के साथ बौद्ध मठों और संघों में विलासिता और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा, जिससे उनका आध्यात्मिक प्रभाव कम हो गया।

  2. विभाजन: बौद्ध धर्म हीनयान, महायान और वज्रयान जैसी कई शाखाओं में बंट गया, जिससे इसकी एकता समाप्त हो गई।

  3. हिंदू धर्म में सुधार: हिंदू धर्म में आए सुधारों और भक्ति आंदोलन के कारण लोग पुनः इसकी ओर आकर्षित होने लगे।

  4. राजकीय संरक्षण का अंत: मौर्य और कुषाण वंश के बाद बौद्ध धर्म को राजाओं से मिलने वाला संरक्षण मिलना कम या बंद हो गया।

  5. विदेशी आक्रमण: हूणों और बाद में तुर्क आक्रमणकारियों ने बौद्ध विहारों और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों को भारी क्षति पहुँचाई।


3. स्तूप क्या होता है? इसके प्रकार और संरचना का वर्णन करें।

उत्तर: स्तूप का अर्थ:

'स्तूप' संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ 'ढेर' या 'टीला' होता है। महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों और अवशेषों को आठ भागों में विभाजित कर उन पर गुंबदाकार समाधियां बनाई गईं, जिन्हें स्तूप कहा जाता है।

स्तूप के प्रकार:

  • शारीरिक स्तूप: जिनमें बुद्ध या उनके प्रमुख शिष्यों के शरीर के अवशेष (दाँत, बाल, नाखून, अस्थियाँ) रखे जाते हैं।

  • पारिभोगिक स्तूप: इनमें बुद्ध द्वारा उपयोग की गई वस्तुएं (भिक्षा पात्र, चरण पादुका, आसन) रखी जाती हैं।

  • उद्देशिक स्तूप: बुद्ध के जीवन से जुड़े पवित्र स्थलों (जन्म, ज्ञान प्राप्ति, उपदेश) की स्मृति में निर्मित स्तूप।

  • संकल्पित स्तूप: बौद्ध तीर्थस्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा अपनी मन्नत पूरी होने पर बनाए गए छोटे स्तूप।

स्तूप की संरचना (Structure):

  1. अंड: स्तूप का निचला अर्ध-गोलाकार हिस्सा 'अंड' कहलाता है।

  2. हर्मिका: अंड के ऊपर एक छज्जे जैसी संरचना होती है जिसे देवताओं का निवास माना जाता है।

  3. यष्टि: हर्मिका के बीच से एक सीधी छड़ी या मस्तूल निकलता है जिसे 'यष्टि' कहते हैं।

  4. छत्र: यष्टि के ऊपर तीन छतरियां होती हैं जिन्हें 'छत्र' कहा जाता है (ये सम्मान और श्रद्धा के प्रतीक हैं)।

  5. वेदिका: स्तूप के चारों ओर सुरक्षा के लिए एक रेलिंग बनी होती है जिसे 'वेदिका' कहते हैं।


4. जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत और पांच व्रतों का उल्लेख करें।

उत्तर: जैन दर्शन के प्रमुख सिद्धांत:

  • अनेकांतवाद: यह माना जाता है कि संपूर्ण विश्व प्राणवान है; पत्थर, जल और अग्नि में भी जीव होता है।

  • कर्मवाद: मनुष्य का जन्म और पुनर्जन्म उसके कर्मों द्वारा निर्धारित होता है।

  • अहिंसा: जैन धर्म का केंद्र बिंदु अहिंसा है, जिसमें छोटे से छोटे जीव की हत्या का भी विरोध है।

जैन धर्म के पांच व्रत (पंच महाव्रत):

(i) अहिंसा: हिंसा न करना।

(ii) सत्य: सदा सत्य बोलना।

(iii) अस्तेय: चोरी न करना।

(iv) अपरिग्रह: संपत्ति का संग्रह न करना।

(v) ब्रह्मचर्य: संयमित और पवित्र जीवन जीना।


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