12th Hindi Chapter 9 प्रगीत और समाज' subjective

12th  Hindi Chapter 9 प्रगीत और समाज' subjective 





अध्याय 9. प्रगीत और समाज


सारांश

डॉ. नामवर सिंह द्वारा रचित निबंध 'प्रगीत और समाज' उनकी आलोचनात्मक पुस्तक 'वाद विवाद संवाद' से लिया गया है। इस निबंध में लेखक ने काव्य की एक विशेष विधा 'प्रगीत' (Lyric) और समाज के बीच के गहरे संबंध को उजागर किया है

1. प्रबंधकाव्य बनाम प्रगीत

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे महान आलोचकों का मानना था कि 'प्रबंधकाव्य' (जिसमें एक लंबी कहानी और कई पात्र होते हैं) ही श्रेष्ठ होता है क्योंकि उसमें समाज का व्यापक चित्रण मिलता है। वे 'प्रगीत' या 'मुक्तक' को कमतर आँकते थे क्योंकि उनमें केवल व्यक्तिगत भावनाएँ होती हैं। नामवर सिंह इस धारणा को चुनौती देते हैं और कहते हैं कि आज के युग में प्रगीत बहुत प्रभावशाली हो गए हैं।

2. व्यक्तिगत अनुभूति में समाज

निबंध का मुख्य तर्क यह है कि जिसे हम कवि का 'निजी' या 'व्यक्तिगत' अनुभव (Self-experience) कहते हैं, वह समाज से अलग नहीं है। जब एक कवि समाज के दबाव, संघर्ष या अकेलेपन को महसूस करता है और उसे कविता में ढालता है, तो वह कविता केवल उसकी नहीं रह जाती, बल्कि उस जैसे हजारों लोगों की आवाज़ बन जाती है। अतः, प्रगीत भी पूरी तरह से सामाजिक होते हैं।

3. मुक्तिबोध और आधुनिक कविता

नामवर सिंह ने गजानन माधव 'मुक्तिबोध' की कविताओं का विशेष उल्लेख किया है। मुक्तिबोध की कविताएँ बहुत 'आत्मपरक' (Subjective) होने के बावजूद समाज के कड़वे यथार्थ और मनुष्य के भीतर के संघर्ष को बखूबी दिखाती हैं। लेखक के अनुसार, मुक्तिबोध ने प्रगीत को एक नया विस्तार दिया है।

4. नए कवियों का योगदान

लेखक ने नागार्जुन, त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह जैसे कवियों की चर्चा की है।

  • त्रिलोचन: इनके प्रगीत गाँव, प्रकृति और साधारण जीवन के संघर्षों को दिखाते हैं।

  • नागार्जुन: इनकी कविताओं में समाज की कुरीतियों पर सीधा प्रहार मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि छोटी कविताएँ (प्रगीत) भी समाज बदलने की शक्ति रखती हैं।

5. एकाकीपन में मानवता की आवाज़

निबंध के अंत में लेखक कहते हैं कि कविता जब एकांत में लिखी जाती है, तब भी वह समाज से कटी हुई नहीं होती। कविता के उस 'अकेलेपन' में भी पूरी मानवता की पुकार छिपी होती है। एक संवेदनशील पाठक ही उस आवाज़ को पहचान सकता है।


निष्कर्ष (Conclusion)

'प्रगीत और समाज' निबंध यह संदेश देता है कि साहित्य में केवल बड़ी कहानियाँ या महाकाव्य ही समाज का दर्पण नहीं होते। एक छोटी-सी आत्मपरक कविता (प्रगीत) भी समाज के यथार्थ, संघर्ष और संवेदनाओं को गहराई से व्यक्त करने में सक्षम है। नामवर सिंह ने इस निबंध के जरिए आधुनिक कविता की नई पहचान स्थापित की है।



- : लेखक परिचय : -

  • लेखक- नामवर सिंह

  • जन्म- 28 जुलाई 1927

  • जन्म-स्थान- जीयनपुर, वाराणसी, उत्तरप्रदेश

  • निधन- 19 फरवरी 2019

  • निधन स्थान- दिल्ली

  • माता- वागेश्वरी देवी

  • पिता- नागर सिंह (एक शिक्षक)

  • शिक्षा –

    • (i) प्राथमिक - आवाजापुर एवं कमालपुर, उत्तरप्रदेश के गाँवों में कियें।

    • (ii) हाई स्कूल- हीवेट क्षत्रिय स्कूल बनारस से किये।

    • (iii) इंटर - उदय प्रताप कॉलेज बनारस से किये।

    • (iv) B.A. (1949) एवं M.A. (1951) - B.H.U. से किये।

    • (v) P.HD (1956)- पृथ्वीराज रासो की भाषा विषय पर B.H.U. से किये।

  • वृत्ति (पेशा) –

    • (i) 1953 ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अस्थायी व्याख्याता बने।

    • (ii) 1959-1960 में सागर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बने रहे।

    • (iii) 1960-1965 तक बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन कार्य कियें।

    • (iv) वें 'जनयुग (साप्ताहिक)' दिल्ली के संपादक और राजकमल प्रकाशन में साहित्य सलाहकार भी बने।

    • (v) 1967 में 'आलोचना' त्रैमासिक पत्रिका का संपादन आरम्भ कियें।

    • (vi) 1970 में जोधपुर विश्वविद्यालय (राजस्थान) में हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर बने।

    • (vii) 1974 में कुछ समय के लिए "कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी विद्यापीठ" आगरा के निदेशक बने।

    • (viii) 1974 में ही "जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय"




लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

1. नामवर सिंह किन कविताओं को श्रेष्ठ मानते हैं?

उत्तर: डॉ. नामवर सिंह के अनुसार, श्रेष्ठ कविताएँ वे हैं जिनमें केवल व्यक्तिगत सुख-दुख का वर्णन न होकर सामाजिक सरोकार भी झलकता हो। वे उन कविताओं को उच्च श्रेणी में रखते हैं जो समाज की चिंताओं को स्वर देती हैं और जिनमें जनमानस की विचारधारा को बदलने की क्रांतिकारी शक्ति होती है। उनके अनुसार, वे कविताएँ जो प्रगतिशील होने के साथ-साथ आत्मपरक (Subjective) भी हों, साहित्य में विशेष महत्व रखती हैं।

2. प्रगीतात्मकता का अर्थ आलोचकों की दृष्टि में क्या है?

उत्तर: आलोचकों की दृष्टि में 'प्रगीतात्मकता' का अर्थ ऐसी काव्य रचना से है जिसमें कवि अपने निजी और नितांत व्यक्तिगत भावों को अभिव्यक्त करता है। इसकी मुख्य विशेषताएँ यह हैं कि इसमें शब्दों का चयन बहुत कम और सटीक होता है, भावों की गहराई अत्यधिक होती है और इसमें संगीत जैसी लयबद्धता या गेयता होती है। आलोचक इसे प्रायः एकांत की अभिव्यक्ति मानते हैं।

3. प्रगीत क्या है?

उत्तर: प्रगीत काव्य की वह विधा है जो पूर्णतः भाव-प्रधान होती है। यह एक संक्षिप्त काव्य रूप है जिसमें कवि अपनी आंतरिक अनुभूतियों, प्रेम, विरह या संघर्ष को बहुत गहराई से व्यक्त करता है। प्रगीत की प्रकृति आत्मपरक होती है, किंतु नामवर सिंह के अनुसार, एक अच्छा प्रगीत वह है जो अपनी वैयक्तिकता के बावजूद समाज के यथार्थ और मनुष्य की सामूहिक चेतना से जुड़ा हो।

4. हिन्दी की आधुनिक कविता की क्या विशेषताएँ आलोचक ने बतायी हैं?

उत्तर: आधुनिक हिन्दी कविता की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें कवि का व्यक्तिगत संघर्ष और सामाजिक यथार्थ एक-दूसरे में घुले-मिले होते हैं। आलोचक के अनुसार, आज की कविता समाज की कड़वी हकीकत को बिना किसी लाग-लपेट के साफ-साफ दिखाने का साहस रखती है। इसमें मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं, अकेलेपन और व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का स्वर प्रमुखता से मिलता है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, 'प्रगीत और समाज' शीर्षक पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य-आदर्श मुख्य रूप से 'प्रबंधकाव्य' थे। उनका मानना था कि प्रबंधकाव्य में ही जीवन का संपूर्ण और व्यापक चित्र उकेरा जा सकता है।

  • व्यापकता: शुक्ल जी के अनुसार, प्रबंधकाव्य में केवल क्षणिक भाव या सौंदर्य नहीं होता, बल्कि उसमें समाज, संस्कृति और मानवीय संबंधों का एक विस्तृत परिदृश्य होता है।

  • सामाजिक उद्देश्य: उनके लिए वही कविता श्रेष्ठ थी जो मानव जीवन के सुख-दुख, संघर्ष और नैतिकता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करे।

  • शिक्षा: वे चाहते थे कि कविता केवल मनोरंजन न बनकर समाज के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाए। वे प्रगीतों (मुक्तकों) को प्रबंध की तुलना में कमतर आँकते थे क्योंकि उनमें जीवन की समग्रता का अभाव होता है।

2. "कला कला के लिए" सिद्धान्त क्या है?

उत्तर: "कला कला के लिए" (Art for Art's sake) एक ऐसा सिद्धांत है जो यह मानता है कि कला का एकमात्र उद्देश्य सौंदर्य की सृष्टि करना है।

  • स्वतंत्रता: इस सिद्धांत के अनुसार कला पूरी तरह स्वतंत्र है। इसे किसी राजनीतिक, सामाजिक या उपदेशात्मक उद्देश्य के बोझ तले नहीं दबाना चाहिए।

  • अभिव्यक्ति: जब कोई कलाकार बाहरी दबावों या लाभ की चिंता किए बिना केवल अपने मन की सुंदर भावनाओं और कल्पनाओं को प्रस्तुत करता है, तो वह शुद्ध कला कहलाती है।

  • विविधता: हर कलाकार का अनुभव और नजरिया अलग होता है, इसलिए कला को किसी एक ढांचे (जैसे समाज सुधार) में नहीं बांधना चाहिए। कला की सफलता इस बात में है कि वह पाठक या दर्शक को कितना आनंद देती है।

3. नामवर सिंह रचित 'प्रगीत और समाज' निबंध की विवेचना करें।

उत्तर: यह निबंध नामवर सिंह की प्रसिद्ध आलोचनात्मक कृति 'वाद विवाद संवाद' से लिया गया है। इस निबंध में नामवर सिंह ने 'प्रगीत' (Lyric) और 'समाज' के अंतर्संबंधों की गहरी पड़ताल की है।

  • नई दृष्टि: नामवर सिंह यह सिद्ध करते हैं कि प्रगीत केवल कवि का निजी विलाप नहीं है, बल्कि उसके भीतर भी सामाजिक संघर्ष छिपा होता है।

  • परंपरा और आधुनिकता: यह निबंध हमें इतिहास और साहित्य की परंपरा को नए नजरिये से पहचानने की प्रेरणा देता है। यह केवल कविता की अच्छाई-बुराई नहीं बताता, बल्कि यह समझाता है कि वर्तमान समय में प्रगीतों की प्रासंगिकता क्या है।

  • निष्कर्ष: लेखक का तर्क है कि सबसे अधिक आत्मपरक कविता भी सबसे अधिक सामाजिक हो सकती है, यदि वह मनुष्य की सच्ची संवेदनाओं से जुड़ी हो।

4. वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अंतर है?

उत्तर: * वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताएँ: ये वे कविताएँ हैं जिनमें कवि अपनी निजी भावनाओं के बजाय बाहरी जगत, समाज और संघर्षों का चित्रण एक नाटक की तरह करता है। जैसे— गजानन माधव 'मुक्तिबोध' की लंबी कविताएँ (उदा. 'अंधेरे में')।

  • अंतर:

    • आत्मपरक प्रगीत: यह आकार में छोटा होता है और इसमें कवि के भीतरी मन की अनुभूति प्रधान होती है। यह 'स्व' (Self) की अभिव्यक्ति है।

    • नाट्यधर्मी कविता: इसमें 'पर' (Others) या बाहरी दुनिया की अनुभूतियाँ होती हैं। यहाँ यथार्थ को पात्रों या स्थितियों के माध्यम से नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। प्रगीत में जो यथार्थ 'भाव' बनकर आता है, नाट्यधर्मी कविता में वही 'दृश्य' बनकर आता है।

5. हिन्दी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है? सोदाहरण स्पष्ट करें।

उत्तर: हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रगीतों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली रहा है।

  • भक्तिकालीन आधार: प्रगीतों की जड़ें विद्यापति के पदों, सूरदास के वात्सल्य और भक्ति के पदों तथा तुलसीदास की 'विनय पत्रिका' में देखी जा सकती हैं। ये सभी पद गेय और आत्मपरक भावना से भरे थे।

  • आधुनिक विस्तार: आधुनिक काल में निराला, प्रसाद और महादेवी वर्मा ने प्रगीतों को नई ऊँचाइयाँ दीं। इसके बाद मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह जैसे कवियों ने प्रगीत को केवल प्रेम तक सीमित न रखकर उसमें आधुनिक जन-संवेदना और वैचारिक संघर्ष को शामिल किया। अतः प्रगीत हमेशा से भारतीय जनमानस के हृदय की आवाज रहे हैं।


सप्रसंग व्याख्या (Contextual Explanation)

प्रश्न: "कविता जो कुछ कह रही है उसे सिर्फ वही समझ सकता है जो इसके एकाकीपन में, मानवता की आवाज सुन सकता है।" [2022]

उत्तर:

  • संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ. नामवर सिंह द्वारा रचित आलोचनात्मक निबंध 'प्रगीत और समाज' से उद्धृत हैं।

  • व्याख्या: इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रगीत कविताएँ अक्सर एकांत या अकेलेपन की उपज लगती हैं। लेकिन एक सच्चा पाठक वही है जो उस कवि के व्यक्तिगत अकेलेपन के पीछे छिपे 'संपूर्ण समाज' के दर्द को पहचान सके। कविता चाहे कितनी भी निजी क्यों न हो, उसमें कहीं न कहीं पूरी मानवता का स्वर गूँजता है। इसे समझने के लिए केवल बुद्धि नहीं, बल्कि गहरी मानवीय संवेदना और सहानुभूति का होना अनिवार्य है।



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