12th History Chapter 5 यात्रियों के नजरिए से subjective QnA
लघु उत्तरीय प्रश्न (इतिहास)
1. अलबरूनी पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:- अलबरूनी का पूरा नाम "मोहम्मद इब्न अहमद अबू रेहान अल-बरूनी" था। उनका जन्म 973 ईस्वी में आधुनिक उज्बेकिस्तान में स्थित 'ख्वारिज्म' में हुआ था। अलबरूनी भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे; उन्हें सीरियाई, फारसी, हिब्रू और संस्कृत जैसी भाषाओं का गहरा ज्ञान था। वे महमूद गजनवी के भारत अभियानों के दौरान भारत आए और यहाँ की परिस्थितियों का आंखों देखा वर्णन अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' में किया।
2. इब्नबतूता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:- इब्नबतूता एक महान यात्री, विद्वान और लेखक थे। उनका पूरा नाम "मुम्मद बिन अब्दुल्ला इब्नबतूता" था। उनका जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को देश के 'टैंजियर' नामक स्थान पर हुआ था। उन्होंने इराक, मक्का, सीरिया, यमन और ओमान आदि देशों की लंबी यात्राएं कीं। वे दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक से मिलने दिल्ली आए। सुल्तान उनके ज्ञान से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें दिल्ली का 'काजी' (न्यायाधीश) नियुक्त कर दिया। उन्होंने अरबी भाषा में 'रेहला' नामक यात्रा वृत्तांत लिखा।
3. फ्रांस्वा बर्नियर पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:- फ्रांस्वा बर्नियर का जन्म 1620 ईस्वी में फ्रांस में हुआ था। वे एक दार्शनिक, इतिहासकार, राजनीतिज्ञ और चिकित्सक (डॉक्टर) थे। वे अवसरों की तलाश में भारत आए थे, उस समय भारत में मुगलों का शासन था। बर्नियर भारत में 1656 ईस्वी से 1668 ईस्वी तक रहे और इस दौरान उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया। उन्होंने अपने अनुभवों को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर' में संकलित किया।
4. भारत आने वाले विदेशी यात्री एवं उनके यात्रा वृत्तांत के नाम लिखें।
उत्तर:- भारत आने वाले प्रमुख विदेशी यात्री और उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें निम्नलिखित हैं:
(i) अलबरूनी – किताब-उल-हिंद
(ii) इब्नबतूता – रेहला
(iii) फ्रांस्वा बर्नियर – ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर
5. 'किताब-उल-हिंद' की दो विशेषताओं को लिखें।
उत्तर:- 'किताब-उल-हिंद' की दो मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
इस पुस्तक में भारतीय धर्म, दर्शन, त्योहारों, रीति-रिवाजों, खगोल विज्ञान और परंपराओं का विस्तृत विवरण दिया गया है।
यह पुस्तक कुल 80 अध्यायों में विभाजित है, जो इसे अत्यंत विशाल और सूचनात्मक बनाती है।
6. 'रेहला' पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:- 'रेहला' इब्नबतूता द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया एक प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत है। इसमें 14वीं शताब्दी के भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का बहुत ही रोचक विवरण मिलता है। इब्नबतूता 1333 ईस्वी में भारत आए थे और 1354 ईस्वी में मोरक्को लौटने के बाद उन्होंने अपनी यादों के आधार पर इस पुस्तक की रचना की।
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7. प्राचीनकाल में लोगों की यात्राओं के उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:- प्राचीन समय में लोगों की यात्राओं के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे:
काम (आजीविका) की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान जाना।
साहस और रोमांच की भावना से प्रेरित होकर नए क्षेत्रों की खोज करना।
व्यापार, युद्ध, धार्मिक अनुष्ठान तथा तीर्थ स्थलों के भ्रमण के लिए।
बाढ़, सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए सुरक्षित स्थानों की खोज।
8. मार्को पोलो कौन था?
उत्तर:- मार्को पोलो इटली (वेनिस) का एक प्रसिद्ध निवासी और यात्री था। वह 13वीं शताब्दी में भारत आया था। उसने विशेष रूप से दक्षिण भारत की सामाजिक और आर्थिक दशा का सुंदर वर्णन किया है। यद्यपि उसके विवरण बहुत विस्तृत नहीं हैं, फिर भी वे मध्यकालीन भारत के इतिहास के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।
9. 'हिंदू' शब्द का प्रयोग कब और कैसे हुआ?
उत्तर:- 'हिंदू' शब्द का उद्भव लगभग 5वीं-6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्रयुक्त होने वाले एक प्राचीन फारसी शब्द से हुआ है। इसका प्रयोग सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए किया जाता था। बाद में अरबी लोगों ने इस फारसी शब्द को जारी रखा और इस क्षेत्र को 'अल-हिंद' तथा यहाँ के निवासियों को 'हिंदी' कहा। कालांतर में तुर्कों ने सिंधु के पूर्व में रहने वाले लोगों को 'हिंदू', उनके निवास क्षेत्र को 'हिंदुस्तान' और उनकी भाषा को 'हिंदवी' का नाम दिया। प्रारंभ में इनमें से कोई भी शब्द धार्मिक पहचान का प्रतीक नहीं था; इसका धार्मिक संदर्भ में प्रयोग बहुत बाद में शुरू हुआ।
10. इब्न बतूता को 'हठी यात्री' क्यों कहा गया है?
उत्तर:- इब्न बतूता को एक 'हठी यात्री' इसलिए कहा जाता है क्योंकि जिस समय उसने अपनी यात्राएं प्रारंभ कीं, उस समय परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन और जोखिम भरी थीं। इसके बावजूद, उसने अपनी जिज्ञासा और दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया, मध्य एशिया, चीन और भारतीय उपमहाद्वीप की विस्तृत यात्राएं कीं। यात्रा के प्रति उसकी यह अटूट निष्ठा और कठिनाइयों के सामने न झुकने की प्रवृत्ति उसे एक हठी यात्री साबित करती है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
1. अल-बरूनी द्वारा वर्णित भारत की सामाजिक व्यवस्था या जाति व्यवस्था का वर्णन करें।
उत्तर:- अल-बरूनी के अनुसार, भारतीय जाति व्यवस्था ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई एक 'वर्ण व्यवस्था' थी। इसमें समाज मुख्य रूप से चार वर्णों में विभाजित था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
जन्म आधारित व्यवस्था: इस व्यवस्था में व्यक्ति के वर्ण का निर्धारण उसके जन्म के आधार पर होता था। उदाहरण के लिए, ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति ब्राह्मण ही कहलाता था।
स्तरीकरण: इसमें ब्राह्मणों को सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त था, जिसके बाद क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आते थे।
तुलनात्मक दृष्टिकोण: अल-बरूनी ने इसकी तुलना फारस की जाति व्यवस्था से की, जहाँ भी चार वर्ग थे (घुड़सवार/शासक, भिक्षु/पुरोहित, वैज्ञानिक/चिकित्सक और कृषक/शिल्पकार)। हालांकि, उसने उल्लेख किया कि फारस में वर्ण का निर्धारण जन्म के बजाय व्यक्ति के कार्य के आधार पर होता था, जो भारत से भिन्न था।
2. इब्न बतूता द्वारा वर्णित दास प्रथा का वर्णन करें।
उत्तर:- इब्न बतूता के विवरणों से पता चलता है कि उस काल में भारत में दास प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित थी:
बाजार में बिक्री: दास सामान्य वस्तुओं की तरह बाजारों में बेचे और खरीदे जाते थे।
उपयोगिता: समाज के लगभग सभी वर्गों के लोग अपनी क्षमतानुसार दास रखते थे। इनका मुख्य उपयोग घरेलू कामकाज के लिए किया जाता था।
लिंग आधारित कार्य: पुरुष दासों का उपयोग मुख्य रूप से पालकी उठाने के लिए किया जाता था। महिला दासों को घरेलू कार्यों के साथ-साथ संगीत और नृत्य कला में भी निपुण किया जाता था।
गुप्तचर के रूप में: सुल्तान और कुछ राजा इन महिला दासों को गुप्तचरों के रूप में लोगों के घरों की निगरानी करने के लिए भी भेजते थे।
3. बर्नियर भारतीय नगरों को किस रूप में देखता था?
उत्तर:- 17वीं शताब्दी के दौरान फ्रांस्वा बर्नियर ने भारतीय नगरों का एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया:
शिविर नगर (Camp Towns): बर्नियर ने मुगलकालीन शहरों को 'शिविर नगर' कहा। उसका मानना था कि ये नगर अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविरों (दरबार) पर निर्भर थे। जब तक राजकीय दरबार वहां रहता, नगर फलता-फूलता था, और दरबार के हटते ही इनका पतन तेजी से होने लगता था।
आर्थिक आधार: उसका मानना था कि इन नगरों की सामाजिक और आर्थिक नींव मजबूत नहीं थी क्योंकि ये पूरी तरह राजकीय संरक्षण पर आश्रित थे।
विविधता: हालांकि, वास्तविकता में उस समय कई प्रकार के नगर अस्तित्व में थे, जैसे उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर और धार्मिक केंद्र।
सामाजिक समूह: पश्चिमी भारत में व्यापारिक समूहों को 'महाजन' कहा जाता था और उनके प्रमुख को 'सेठ' कहते थे। शहरों में अन्य व्यावसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक, अध्यापक, वकील, चित्रकार और वास्तुविद् भी रहते थे।

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